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मस्ती के रंग

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14 Posts

206 comments

basanti


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बसंती जा रही है गाँव वालो

Posted On: 27 Mar, 2013  
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जनरल डब्बा में

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मस्ती के रंग

Posted On: 27 Mar, 2013  
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जनरल डब्बा में

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बसंती के चटकीले रंग

Posted On: 26 Mar, 2013  
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जनरल डब्बा में

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बसंती के संग हैं सजे कई और रंग

Posted On: 25 Mar, 2013  
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जनरल डब्बा में

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हास्य कवि सम्मेलन छींटे और बौछारे

Posted On: 24 Mar, 2013  
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जनरल डब्बा में

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कुछ मनभावन रंग होली के

Posted On: 23 Mar, 2013  
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जनरल डब्बा में

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जागरण की शोले

Posted On: 22 Mar, 2013  
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जनरल डब्बा में

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ससुराल में प्रथम होली

Posted On: 21 Mar, 2013  
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जनरल डब्बा में

39 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: mahipalsingh mahipalsingh

पूज्य एवं आदरणीया बसंती जी, सादर अभिवादन | :) यूं के रामगढ़ का तो हमे पता नहीं लेकिन हमारे भोजपुरिया मिट्टी मे आज (प्रतिपदा को) हीं होली मनाई जाती है | इसीलिए होली की हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाइयाँ ........ क्या सोंचा था 10 दिन तक पाण्डेय जी को भंग पिलाकर नचाएंगी और यूं हीं छूट जाएंगी | एक अदद शरारत तो खुदा के इस नेक बंदे को भी बनता है :D अभी तक जो बैजू ने कहा है वो भंग पीकर, अब जो कहता है उसे सुनिए .... ------------------------------------------------------------- अपने सतरंगी रंगों से सबके दिलों को रंगने वाली बसंती जी, पूरे मंच को एक सूत्र मे पिरोने वाली बसंती जी, गोझिया पकवानो से सबका पेट भरने वाली बसंती जी, भारत की आत्मा मे स्नेह का रंग घोलने वाली बसंती जी, बैजनाथ हीं क्या हर कोई यहाँ आपके प्यार भरी शरारत और शरारत भरे प्यार का गुलाम होकर रह गया | ऐसा लगा जैसे कोई ताजा हवा का झोंका आया हो और समूचे आशियाने को महकाकर चला गया हो | बेशक, आप चली गयी हैं, लेकिन आपकी सद्भावना भरी खुशबू अभी भी हवा मे तैर रही है | हम सब मुरीद हो गए हैं आपकी इस अदा के ........ मंच के सभी माननीया सदस्यों को जिन्होने इतने जतन से इस होली को यादगार बनाया, उन नारी शक्ति को बैजनाथ का कोटि-कोटि नमन | होली के प्यारे रंग आपसबों को हीं मुबारक हो | व्यक्तिगत तौर पर होली के उल्लास मे हमने जो हुल्लड़बाज़ियाँ की है अगर उससे किसी का भी दिल दुखा हो तो करबद्ध होकर क्षमाप्रार्थी हूँ | बैजनाथ अभी बड़ा नहीं हुआ, तभी तो शरारत करता है, पकवान भी चट कर जाता है और रंग भी फेंकता है :) इस मंच के सभी सम्मानित सहभागियों को भी मेरी ओर से सपरिवार होली की शुभकामना व बधाई ...आपसबों के पधारने से होली असल मे होली बन गयी .... अंत मे हम सब की चहेती बसंती से यही याचना है की वह फिर से यहाँ आए , बार बार आए .... हर त्योहार मे आकर यूं ही सद्भावना के दीप जलाती रहे | बैजनाथ तो बावला है, जब जब मौसम लहराएगा, यूं हीं भंगड़ा पा लेगा | एकबार पुनः आपसबों को होली पावन मनभावन की ढेर सारी शुभकामनायें | होली है !

के द्वारा: baijnathpandey baijnathpandey

बसन्ती जी, नमस्कार! आप चाहे जो भी हो बहुत याद आओगे/आओगी.... ऐसी होली न कभी देखी न सुनी थी ... आपका सबको एक सूत्र में बांधने का अंदाज अनूठा, नायाब, बेमिशाल था ... आपने अपनी पहचान नहीं बताई या यह बताई की आप राग है रंग है बहार है, ये मुझमे है तुझमे है सारा जहाँ है बसंती फूलो भरा गुलिश्तां है ये ठंडी शीतल बयार है बसंती खुशियों भरा आशियाँ है ये गमक उठे वो जहाँ है बसंती सूर्य की लालिमा है ये सब के जीवन का सार है बसंती प्यरा मोहब्बत से जवाँ है ये ही जिंदगानी का उपहार है बसंती चांदनी सी सदाबहार है ये उजली उजली मुस्कान है बसंती कोयल पपीहे का गान है ये राग रागिनी सी मीठी तान है यह भी सही ही है ...जिन आदरणीयों के प्रयास से यह पूरा मंच जगमगाता रहा वह भी यादगार रहेगा ...उम्मीद है आप मिलते/मिलती रहोगे/रहोगी क्योंकि आप तो हम सब के दिलों में हो! जय हो बसन्ती जय होली ! होली के दिन दिल मिल जाते हैं ..........

के द्वारा: jlsingh jlsingh

अब तू जा रही है बसंती तो दिल मे आह सी उठ रही है ....... जगह जगह पर मैंने जो तेरी चोली खींची है उसके लिए किसको दोष दूँ ........ वैसे तू फिर भी मुस्कुरा रही है तो दिल मे राहत सी है | सब जानते हैं बसंती कि तूने जीतने तीर चलाये हैं उतने खाये भी हैं फिर कैसा गिला-शिकवा ........ होली की बधाई सपरिवार लेती जा | जैसा कि सब जानते हैं पाण्डेय जी ने भी ये दोहा पढ़ी थी, रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय | टूटे तो फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाय || यूं के पाण्डेय जी का दिल भी स्टील का नहीं है | उन्होने भी रहीम के लिए कुछ अर्ज किया है, गोली खाये भंग की, पाण्डेय जी को छोड़ | टूटे तो फिर बाद मे, पहले धागा जोड़ || पहले धागा जोड़, यहाँ सब नाना-नानी | जाने कौन यहाँ किसमे है कितना पानी || सबको अपना मान, तभी होवे हैं होली | कह “बैजू” वैसे तो सब देते हैं गोली || ................... आशा है तू दिल पे नहीं लेगी, यहाँ तो लोगों का आना जाना लगा हीं रहता है ....... तुझको प्यार भरा मेरा भी अलविदा |

के द्वारा: baijnathpandey baijnathpandey

बसंती आप जा रही हो , मन तो करता है रोक ले आपको पर पता है आप नहीं रुकोगी. इस फागुन में खूब सारे मस्ती के रंग बिखेरे आपने. सबको खूब हसाया और खूब भरमाया भी. हर दिन एक नई रचना के साथ आप मंच पर आई और सबसे खास ये की किसी को भी भूली नहीं आप. माँ भारती का ये छोटा बेटा जिसने अभी बस कलम पकड़ना ही सिखा है, आपने उसके लिए भी लिखा, पढ़ कर मन खुश हो गया. बसंती जी अब तक ये नहीं पता की आप कौन हो पर एक बात पता है बसंती हर वो इन्सान है जिसके मन में बिना भेद भाव के सबके लिए प्रेम है. अब आप जा रहे तो इस परिवार के सदस्य के रूप में बस इतनी इल्तजा है कि बस यूँ ही रंग बनकर हम सब के जीवन में छाते रहिएगा और यूँ ही हम सब के चेहरे की मुस्कान बन कर मुस्कुराते रहिएगा. आभार सहित अलविदा बसंती जी.  कुमार विशाल

के द्वारा: Kumar Vishal (guglumuglu) Kumar Vishal (guglumuglu)

हम इन्तजार करेंगे तेरी (आपकी) क़यामत तक! हम इन्तज़ार करेंगे तेरा क़यामत तक ख़ुदा करे कि क़यामत हो और तू आए ...यह इन्तज़ार भी एक इम्तेहान होता है इसी से इश्क का शोला जवान होता है, यह इन्तज़ार सलामत हो और तू आए बिछाए शौक़ के सजदे वफ़ा की राहों में खड़े हैं दीद की हसरत ... उम्मीद पे दुनिया कायम है और यह जागरण जंक्सन का परिवार हमेशा खुशहाल रहे! बहुत ही सुन्दर वातावरण बना और सब बसन्ती रंग में रंग गए साहित्य संगम और फेसबुक पर भी बसन्ती की चर्चा होती रही यूं की पूरा वातावरण बसन्ती हो गया! मेरा रंग दे बसन्ती चोला माये रंग दे बसन्ती चोला. रंग बसन्ती, अंग बसन्ती, संग बसन्ती, आ गया, मस्ताना मौसम छा गया!.... कल फिर मिलेंगे!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

अब और लो साहिब । एक तो हम यूँ ही परेशान, ऊपर से आप कर रहे हैं पुलिन्दा बाँधने का सामान । कुछ खाना-पीना है तो अभी भंग की बरफ़ी का पूरा डब्बा पड़ा है, जी भरकर भकोस लीजिये । खाइये-खाइये ! मशहूर पंजाब स्वीट हाउस वाले का है भाई जी, अभी अभी अपना विशाल पहुँचाकर गया है । विशाल को तो आप जानते ही होंगे हालांकि थोड़ा कम ही दिखाई देता है आजकल फ़ेसबुक पर भी । भाभी जी की बात छोड़िये, उनसे तो वैसे ही हाड़ काँपता है । उन्हें आजकल जब-तब अंधेरे में उठकर हमारा कम्प्यूटर के की-बोर्ड पर खटर-पटर करना ज़रा भी पसन्द नहीं आ रहा है । क्या करें, कुछ उपाय बताइये, खाली समस्या न क्रियेट कीजिये हर जगह । क्या बढ़िया होली का रंग जम रहा था, अबतक तो मंच पर धमाचौकड़ी का भूचाल आ चुका होता । आपको ना जाने क्या सूझी कि आपने अन्जाने में ही बसन्ती की बूढ़ी मौसी की तरह बीच में भांजी मारकर सबको तितर-बितर कर दिया । अब तो समय भी नहीं बचा, शायद आज ही होलिका दहन है और कल से परसों तक अब कौन भला अपने कम्प्यूटर को रंगीन पानी, अबीर और गुलाल से नहलवाना पसन्द करेगा ! हम भी आज सचमुच के 'रामगढ़' की ओर सपरिवार प्रस्थान कर रहे हैं, होली उधर ही मनेगी । अब लौटने के बाद ही अपने बचे-खुचे बालों को नोचवाने हेतु खुद को प्रस्तुत करेंगे । क्या विडम्बना है, आप में से किसी को मेरे सफ़ेद बाल पसन्द हैं, तो किसी को काले वाले । जिसको जब मौका मिलता है, अपने नापसन्दगी वाले में से उखाड़-उखाड़ कर फ़ेंकता जाता है । तो फ़िर क्या बचेगा, अब ज़रा इसपर भी ज़रूर गौर फ़रमाइयेगा । इस मज़ाक को भी किसी कानून से जोड़कर मत देखियेगा … हा हा हा हा ! रंगारंग होली की सपरिवार बहुत-बहुत बधाइयाँ व शुभकामनाएँ … आपको भी, बसन्ती को भी, मंच के सभी महिला-पुरुष आत्मीय मित्रजनों को भी । मिलते हैं फ़िर, होली मनाकर …विदा !

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

अमाँ खाँ रतूड़ी साब, क्या क्ये रिये हो आप ? म्यें कुछ समझा नहीं । ये दिड़की क्या बला है भई ? हमने तो कभी भोपाल में भी नहीं सुना ये नाम । कहीं किसी नए गुलाल का ब्रांड नेम तो नहीं है ? बहुत प्येले एक फ़िल्म में किसी की पुंगी बजाई थी । बस वो दिन है, और आज का दिन, किसी को बुरी नज़र से घूरा तक नहीं । वेसे भी सुना हे, के अब किसी को घूरना भी अपनी पुंगी बजवा सकता है । जवाहर मियाँ कल हमें हड़का रहे थे, तो समझो कि मौके से भाग लिये वरना पता नहीं क्या हो जाता । और आप कहते हो कि मियाँ वाहिद और घंटाल गुरु की छुट्टी हमने की थी ! अरे भइया, ज़रा आहिश्ता बोलो, वरना म्यें तो लपेटे में आऊँगा ही, उधर बड़े घर में जाकर नाम ले लिया, तो आप भी नप जाओगे, हाँ !! और बताओ मियाँ, कैसे हो ? चेहरे पर तो बड़ी करारी डन-डन हो रही है । लगता है नींद में चलने वाली बीमारी के डाक्टरों ने कोई ऐसी वर्ज़िश बताई है, जिससे चेहरा सुर्ख हुआ जा रिया है । कहीं दो लगाकर तो नहीं आ गए खाँ ? हा हा हा -'इसके पीने से तवीयत पे रवानी आए…इसको बूढ़ा भी जो पी ले तो जवानी आए…इस क़दर पी ले के रग-रग में सुरूर आ जाए… कसरते मय से तेरे चेहरे पे नूर आ जाए…' क्या समझे पंडत जी ? लो पान खा लो । ले लो, ले लो भइया… बहोत मज़े का पान है । चलो अब तांगे वाली से मिलवाता हूँ ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

अजी माजरा क्या होगा ? यूँ कि कौन है जो आपको नहीं जानता छम्मकछल्लो जी ! आपही हैं जिन्होंने धरम प्रा जी का धरम भ्रष्ट कर उन्हें विधर्मी बनने पर मजबूर कर दिया था । आपही हैं जिन्होंने उन्हें इसी शोले में साइकिल को उल्टी चलाने पर मजबूर किया था । बोलो-बोलो, चुप क्यूँ हो महारानी ? किसने नहीं देखा एक 'ही-मैन' को तांगे वाली के पीछे भागकर गाते हुए ? क्या था ? हाँ याद आया - ज़ुल्फ़ों में छैयाँ, मुखड़े पे धूप है, बड़ा मज़ेदार गोरी ये … ये तेरा रंग रूप है । कोई तांगे वाली जब रूठ जाती है तो, है तो, और नमकीन हो जाती है … अब ज़रा बताओ अपनी मौसी की छोकरिया, जब धरम प्रा जी जैसे गबरू जवान को तूने भेंड़ा बना दिया, तो ये दिवंगत मुर्दा आत्माएं भला किस खेत की मूली हैं ? मुझे पता चला है कि इधर तुम्हारा दिल कुछ-कुछ हमारी तरफ़ भी खिंचने लगा है (जवाहर जी और बैजनाथ जी को खुसुर-फ़ुसुर करते सुना था) । तभी से चिन्ता में पड़ गए हैं । ना भई ना… हमें धरम प्रा जी से अपना जबड़ा नहीं तुड़वाना । हमारी अपनी अलग तांगे वाली है, उसी के प्रति वफ़ादार बने रहेंगे । वह तो तुम्हारी सूरत थोड़ी बहुत उससे मिलती-जुलती है, इसलिये कभी कभार चोर निगाहों से तुम्हारी तरफ़ देख लेते हैं । वैसे ही आजकल उसका मुंह कुछ फ़ूला-फ़ूला सा लग रहा है, हम कोई रिस्क नहीं ले सकते… ना !!!!

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

लो जी, यह ब्लाग तो फ़िर से खुल गया । मैंने तुम्हारे सवालों के जवाब जो इसके बाद वाले ब्लाग पर डाला है, वह इस प्रकार है ---( बसन्ती, ये क्या गोलमाल है भई ? अभी मैं इसी पोस्ट पर वाजपेयी सर वाले तुम्हारे सवाल का जवाब दे रहा था, तबतक तुमने फ़िर उस ब्लाग की काया पलट कर दी । अब तुम ग़ ग़ ग़लत कर रही हो बसन्ती । वह ब्लाग कहाँ गया ? खैर, जवाब सुन लो । मैंने उसमें लिखा था कि 'वाजपेयी सर अब हमारे बीच नहीं रहे' । क्या जो हमारे बीच नहीं होता है, वह दुनिया छोड़कर चला जाता है ? दुनिया छोड़ें वाजपेयी और कुशवाहा सर जी के दुश्मन । कुशवाहा जी फ़िलहाल मंच से ग़ायब चल रहे हैं, इसलिये मैं करुण विलाप करते हुए उन्हें ढूँढ रहा था । तुम कहोगी कि वो भी अब दुनिया में नहीं रहे, इसलिये मैं ज़ार-ज़ार रोए जा रहा था । बड़ी तेजू खाँव बन रही थीं, आ गईं न गब्बर के झाँसे में ? 'वो तो हर रोज़ रुलाते हैं घटाओं की तरह … हमने इक रोज़ रुलाया तो बुरा मान गए ?' हाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहा हा हा हा हा !)

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

बसन्ती, ये क्या गोलमाल है भई ? अभी मैं इसी पोस्ट पर वाजपेयी सर वाले तुम्हारे सवाल का जवाब दे रहा था, तबतक तुमने फ़िर उस ब्लाग की काया पलट कर दी । अब तुम ग़ ग़ ग़लत कर रही हो बसन्ती । वह ब्लाग कहाँ गया ? खैर, जवाब सुन लो । मैंने उसमें लिखा था कि 'वाजपेयी सर अब हमारे बीच नहीं रहे' । क्या जो हमारे बीच नहीं होता है, वह दुनिया छोड़कर चला जाता है ? दुनिया छोड़ें वाजपेयी और कुशवाहा सर जी के दुश्मन । कुशवाहा जी फ़िलहाल मंच से ग़ायब चल रहे हैं, इसलिये मैं करुण विलाप करते हुए उन्हें ढूँढ रहा था । तुम कहोगी कि वो भी अब दुनिया में नहीं रहे, इसलिये मैं ज़ार-ज़ार रोए जा रहा था । बड़ी तेजू खाँव बन रही थीं, आ गईं न गब्बर के झाँसे में ? 'वो तो हर रोज़ रुलाते हैं घटाओं की तरह … हमने इक रोज़ रुलाया तो बुरा मान गए ?' हाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहा हा हा हा हा !

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

यूँ के शाही मिया,.............. आप ने जिस प्रकार से रमेश बाजपयी जी के लिए कहा है अगर ये सच है तो बसंती को बहुत खेद है साथ ही ये दुखद समाचार बंसती चाहेगी मंच के बाकी सदस्यों को भी जानकरी में होनी चाहिए यूँ की बसंती ने हमेशा मंच को एक परिवार की तरह ही देखा है एक की खुशी सब की खुशी एक का दुःख मंच का दुःख बनके उभरा है.............. यूँ के आप की बात सच है तो किसी ने भी अभी तक ये दुखद समाचार मंच के सभी साथियों के साथ साझा नहीं किया.................. यूँ के बसंती बताये देती है रमेश बाजपाई जी की एड रिक्वेस्ट बसंती के फेसबुक अकाउंट में बाजपाई जी के द्वारा ही आई थी ................ अगर ये आप का मजा है तो कृपया शाही मिया कठोर ना बनिए............... बताये देते है

के द्वारा: basanti basanti

अरे कठोर ! अब दिवंगत आत्माओं पर भी चक्कर चलाने लगीं ? ओह ! क्या बात थी हमारे वाजपेयी सर में । वैसा आत्मीय न तो कभी देखा, न सुना । सबको साथ लेकर चलना जानते थे । यारों के यार थे, बड़े ही ग़मख्वार थे, कामधेनु की धार थे, प्रभु-प्रेम के बीमार थे, वीणा के तार थे, स्नेह के आगार थे, वैजयन्ती के हार थे । अब हमारे बीच नहीं रहे । श्रद्धेय कुशवाहा जी की याद भी ना दिलाओ बसन्ती ! कवियों के कवि और शायरों के शायर, जैसे जला हुआ टायर, नहीं थी कोई फ़ालतू डिजायर, पर हमसे जुड़े हुए थे उनके वायर । कुशवाहा जी ,,, मैं आ रहा हूँ । इस मिथ्या जगत में अब मेरा कोई नहीं रहा । न यार ना दोस्त, न कोई संगी ना साथी । क्यों चले गए मुझे यूँ तड़पता छोड़कर मेरे मुच्छड़ मित्र ? ओ दूर के मुसाफ़िर … हमको भी साथ ले ले रे …हमको भी साथ ले ले, हम रह गए अकेले … बस रह गए अकेले … हाँ हाँ जी हाँ अकेले । बू हू हू… (अरे बांगड़ुओं, रूमाल नहीं तो कोई टिशू पेपर ही दे दो …)

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

लो जी लो, अब तो हम श्रीमती धर्मेन्द्र जी के और भी मुरीद होते जा रहे हैं । उन्होंने सही में सबको घनचक्कर बनाकर रख दिया है । अब आपको यह भी लगने लगा कि मैं बसन्ती को जानता भी हूँ, और उससे कहकर कोई ब्लाग डिलीट करवा सकता हूँ, या शायद लिखवा भी सकता हूँ । अरे भाई साहब, कसम आपकी मैं खुद हैरान हूँ कि ये आफ़त की परकाला आखिर है कौन ! आपकी टिप्पणी पढ़ने के बाद देखा तो सचमुच वह ब्लाग जिसका सुबह में नाम कुछ और था, कहीं नज़र नहीं आया । मैंने उसपर एक लम्बी व्यंग्यात्मक टिप्पणी लिखी थी ढेर सारे पुराने साथियों को लपेटते हुए, इसलिये घबरा गया कि कहीं मेरी टिप्पणी नागवार लगने के कारण तो ब्लागर ने डिलीट नहीं कर दी ! नए नाम वाले ब्लाग पर गया तो और चकरा गया । नीचे मेरी टिप्पणी सहित सभी टिप्पणियाँ मौज़ूद होने के बावज़ूद न वह शीर्षक था, न ही बसन्ती की वह स्वनामधन्य कविता, न ही वे पोस्टर्स आदि ही थे । अर्थात नीचे की पतलून वही थी, लेकिन ऊपर का टीशर्ट निकाल कर बसन्ती ने उसपर नया झकझक मलमली कुर्ता पहना दिया है । यह कोई शातिर कलाकार है मेरे भाई, भ्रमित न होइये, और मज़ा लीजिये ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

श्रद्धेय शाही साहब, सादर अभिवादन! मेरे मन में सवाल या आशंका थी सो मैंने कह/लिख डाली. आपने समुचित समाधान युक्त मर्यादित जवाब भी दे दिया.... बात ख़त्म थी. मैंने आपको अपना अग्रज, और श्रद्धेय ही माना है. आपसे सलाह मशविरा करता रहा हूँ! मैंने अपनी आशंका के साथ - "अगर मेरी इस दुर्भावना को भी अगर जुर्म समझा गया तो …. बुरा मानो होली है! … कहने से काम चल जायेगा क्या?????" लिखा था. आपने लगता है इसे ज्यादा गंभीरता से ले लिया औए इसके बाद का ब्लॉग यूँ की पिक्चर अभी बाकी है डिलीट करवा दिया या बसंती जी ने डिलीट कर दिया! आदरणीय राजकमल जी को मैं अपना गुरुदेव ही मानता रहा हूँ. कुछ नए ब्लोग्गर्स के बर्ताव से खिन्न होकर उन्होंने मंच से विदा ली थी उन्हें भी मैंने बहुत बार मेल लिखा था, पर एक का भी जवाब उन्होंने नहीं दिया. फिर भी अगर मुझसे अनजाने में भी कुछ गलती हो गयी है तो अपने छोटे भाई समझ कर माफ़ करेंगे... यह मेरा आपसे और सभी से निवेदन है! मैं यथा सम्भव सहयोग करता रहूँगा और आपसे यही अपेक्षा करूंगा की मेरा मार्गदर्शन अवश्य करेंगे! सादर !

के द्वारा: jlsingh jlsingh

अब और क्या बताएगी जब सबकुछ उगल ही दिया तो । इतना बक-बक कर लेती है, तो समझाती क्यूँ नहीं मियाँ चातक, मयंक और अश्विनी जी को ? शिक्षक बहाली के ग्रहण वाले घनचक्कर में मयंक जी ऐसे उलझे कि बेचारे का हृदय ही विदीर्ण हो गया । जब दिल में होली जल रही हो, तो राग-रंग कहीं मन को भाता है क्या ? स्वत: प्रेरित होकर आए तो आए, वरना ऐसे लोगों का जय और वीरू की तरह कोई एक ठिकाना तो होता नहीं । रहे अश्विनी जी, तो यूँ के वही मिसाल हो गई कि 'भँवरे ने खिलाया फ़ूल, फ़ूल को ले गया राजकुँवर …के मन अब भटके इधर-उधर … ना जाने तू है किधर-किधर … के आ जा अब तो इधर-इधर …' और भी ना जाने क्या क्या । चातक जी आजकल सन्यासी हो गए हैं । पिछले दिनों अघोरपंथ पर रिसर्च का शौक चर्राया (इंजीनियर जो हैं) तो श्मशान का चक्कर लगाते लगाते बोध हुआ कि इस साधना के लिये एक अदद भैरवी चाहिये । तलाशने के बाद जिसके पीछे पड़े, उसने कुछ दिनों तक बेचारे के दिल से खेलकर पल्ला झाड़ लिया । बस तबसे वैराग्य और गहरा गया है, और गुमसुम से श्मशान से लेकर संस्थान तक भटकते फ़िर रहे हैं । रतूड़ी जी बदल गए हैं । नींद में चलने की बीमारी ने इधर कुछ ज़्यादा ही घेर लिया है उन्हें । मंच से एक लगाव रहा है, इसलिये जब कभी गहरी निद्रा में मग्न होते हैं, यंत्रचालित से खड़े होकर सिस्टम तक आते हैं, एक अदद समसामयिक पुराने ब्लाग को खोलकर उसे री-पब्लिश करने के बाद फ़िर लम्बी तान लेते हैं । सुबह उठने के बाद उन्हें कुछ याद नहीं रहता कि रात में कुछ हुआ भी है । वाहिद मियाँ को कोई नाराज़गी नहीं है, बस ज़रा बनारसी होकर भी पता नहीं कैसे ठगों के एक गिरोह के चंगुल में आ गए, जो उन्हें भरमाकर उनके इल्म का शोषण करते हुए इतना व्यस्त रखता है कि दम मारने की भी फ़ुर्सत आज उनके पास नहीं है । कवि शशिभूषण मनमौजी स्वभाव के हैं । जैसे फ़ुनकियहवा बनारसी साँढ़ नहीं होता है ? कुछ वैसे ही हैं, जानती ही हो । जबतक गलियों में फ़िरते दो चार को रगड़ न लें, उनकी ठंडई उतरती ही नहीं है । भोलेनाथ की तरह कब रुष्ट और कब प्रसन्न, कोई नहीं जानता । सरिता जी फ़िलहाल बड़े इमामबाड़े की सैर करते-करते उसी में कहीं गुम हैं । रास्ता मिल जाएगा तो आ जाएंगी । राजकमल शर्मा उर्फ़ गुरुघंटाल की अलग ट्रेजेडी है । इधर मंच पर नए लोगों की भीड़ बढ़ी, तो एक दिन उन्होंने आईने के सामने खड़ा होकर अपना जायज़ा लिया । कनपटी पर एक सफ़ेद बाल दिखते ही उन्हें राजा दशरथ की तरह ज्ञान प्राप्त हो गया । पुत्रादि रत्न का कभी जुगाड़ किया नहीं कि राज्याभिषेक कराकर रुख्सत हों, सो यूँ ही लकुटी कम्बल उठाते एक दिन जंगल को पयाम कर गए । लेकिन ऐसी हठी रूहों का कोई भरोसा नहीं होता, कभी भी गले का जंजाल बनने के लिये प्रकट हो सकते हैं । और किसका क्या बताएँ बसन्ती, कोई नाम छूटा हो तो बताओ, उसकी भी खोलने की कोशिश करेंगे । हम भी अब दुखी-दुखी सा महसूस कर रहे हैं । क्योंकि देखी ज़माने की यारी…बिछड़े सभी बारी बारी । हम पके आमों का क्या भरोसा, कि कब टपक पड़ें । जब तक हैं, तुम्हें मंचपुराण की कहानियाँ सुनाकर तुम्हारा दिल बहलाते रहेंगे । अब हमें नींद आ रही है… एक लोरी गाकर सुनाओ तो थोड़ी झपकी ले लें … आँ आँ…हँ !

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

के द्वारा: D33P D33P

मेरी नीचे की टिप्पणी के क्रम में कुछ और बातों का ज़िक्र भी उचित रहेगा । हमारे देश में मातृशक्ति (स्त्री) के साथ किसी भी पुरुष के व्यवहार/संभाषण हेतु मर्यादा की एक अव्यक्त लक्ष्मण-रेखा होती है, जिसके लिये कोई अलग से आचारसंहिता नहीं है, परन्तु उसका पालन सबके लिये अनिवार्य होता है । ये नियम समाज ने बनाए हैं, और हर ज़िम्मेदार व्यक्ति इन नियमों से परिचित होता है । पुराने समय से ही होली जैसे त्योहार में भी ये नियम स्वत: लागू रहे हैं, और उनके अन्दर रहकर ही इस त्योहार का भरपूर आनन्द लेने की भी परम्परा रही है । कहना नहीं होगा कि यहाँ आभासी होली में भी वे नियम लागू हैं, और बिना कहे भी सभी उसका पालन भी करेंगे, ऐसा विश्वास है । यहाँ बसन्ती के ब्लाग पर मात्र एक ही बात का भय था कि कोई छद्मरूपी जीव घुसकर माहौल न बिगाड़ सके, या कोई ऊलजलूल हरक़त न करे । इसकी कोई सम्भावना ब्लागर ने नहीं छोड़ी है । आप जान रहे हैं कि इस ब्लाग पर लाग इन कर के ही कोई टिप्पणी लिखी जा सकती है, अत: अपनी पहचान छुपा कर अमर्यादित भाषा का प्रयोग सम्भव है ही नहीं । और जो अपना होगा, जिसका एकदूसरे से प्रेमपूर्ण भावनात्मक सम्बन्ध होगा, वह एक दूसरे के प्रति मर्यादित और सम्मानजनक व्यवहार भी पूरी ज़िम्मेदारी के साथ करेगा ही, उसे सिखाना नहीं होगा । इस लिये दिल खोलकर होली का आनन्द लें, बिना मन में कोई भेद रखे । अन्यथा फ़िर तांगे वाली बसन्ती के साथ अन्याय ही कहा जाएगा । बहुत औपचारिक होली के लिये तो सभी अपना अपना चार-चार लाइन का रंगरंगीला ब्लाग लिखें, उसपर आने वाले हाय हैलो शुक्रिया आभार धन्यवाद करते हुए गुज़र जायँ, रोका तो किसी ने है नहीं ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

लेकिन आपने डरा दिया भाई जी । अभी तक तो मैं उन्हीं के साथ चकल्लस करता फ़िर रहा हूँ जिनसे पहले से ही बेतकल्लुफ़ हूँ, और वे भी मुझसे हर स्तर पर हँस बोल लेती हैं । निशा जी, रौशनी, विनीता जी, दिव्या, अलका जी आदि । रेखा और रचना जी की टिप्पणियों का इंतज़ार कर रहा था । उसके बाद मेरा प्रोग्राम जुछ ऐसी नई महिला ब्लागर्स की ओर बढ़कर उन्हें भी हुड़दंग में शामिल करने का था, जिनसे अभी कोई खास परिचय भी नहीं है । इस बीच आपने नए कानून का हवाला क्यों दे दिया ? हलवे में कंकड़ की तरह । ऐसा कुछ नहीं है भाई जी । कानून बनते हैं व्यवस्था को बहाल रखने के लिये, न कि इन्सानी नैसर्गिक रिश्तों और उसकी उचित भावनात्मक मांगों को नकारने या उन्हें समाप्त करने के लिये । सो ब्रदर, बी चीरफ़ुल एंड एन्ज्वाय दिस अनफ़ार्गेटेबुल हिस्टोरिकल होली आफ़ आवर मंच … ओके ?

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

हा-हा ! कानून अपना असर दिखाने लगा । लोग डरने लगे कानून से । लोकतंत्र की स्वस्थ परम्पराएं अपना काम कर रही हैं । लेकिन देखने वाली बात ये भी है कि कानून से डर कौन रहा है ? वह, जिसे अब निडर हो जाना चाहिये । वह डरें तब न, जिनके लिये कानून बनाया गया है ! वे नहीं डरने वाले भाई जी, वारदातें और बढ़ती जा रही हैं । लेकिन ये रंग में भंग क्यों डाल रहे हैं भाई जी, भंग ही डालनी है तो इस गब्बर के कंठ में उँड़ेलिये, जो ना जाने कब से प्यासा है उमंग का, तरंग का, और भंग का भी । हमने तो दीप्ति जी को पहले ही कह दिया है कि, 'भेज दे चाहे जेल में, रंग के इस खेल में, तेरा पीछा ना मैं छोड़ूँगा …'। मैं फ़िर एक बार बा-होशोहवास देवी का आवाहन कर रहा हूँ भाई जी - 'आवाहनम ना जानामि, ना जानामि विसर्जनम' …ना मांगे ये सोना-चाँदी मांगे दर्शन देवी, तेरे द्वार खड़ा एक जोगी… जोगी जी धीरे-धीरे …

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

" रंगीली - प्यारी होली आई . . . " ( बुरा मानने की कोई बात नहीं रंगों की- शब्दों की मस्त फुहारें हैं , जिसमें सभी भीगना चाहतें हैं ) वैसे बसंती जी इस बार जागरण में - होली के गुलाल- अबीर और अनेक रंगों से भरे मंच पर एक साथ हम मित्रों -सखियों का यूं मिलना --मानो .. एक ख्वाब जो हकीकत बना ...सच में भोर की किरणों सी लाल गुलाल में निशा जी और हरे गुलाल में सदा हरियाली बिखेरती अलका जी - संग ले मुझे -फिर दिव्या की सुन्दर रंगोली की पहेली बूझते हुए ..हम सब ने दीप्ति जी के पकवानों की स्वाद से भरे खजानों की धूम ऎसी मचाई ..आन अचानक सरिता जी और मीनू झा ने तेजधार रंगों की मारी ..प्यारी विनीता चुप्पी तोड़ मस्त हंस गुल्ले बिखेरने लगी ..जिसे हम सब ने मिलके लूटा ...फिर धूम मच गयी रंगों की रंगों की बौछारों की ..हाँ हम सबने - हर्बल रंग से ऎसी खेली होली जिसे देख रोशनी जी बोली- रंग जाने दो मेरी हवेली -आज प्यार के रंगो से " - आज प्यार के रंगों से रंग जाने दो मेरी हवेली !" वास्तव में प्यारी सभी सखियों- मित्रों प्यार का रंग ही चोखा होता है बाक़ी रंग तो फीके होते है . इस बार बसंती जी आपके कारण ऐसा अहसास हुआ कि- हम सखियों ने मिलकर घर के आँगन में- जम के खेली है होली ! आप सभी सखियों - बसंती जी , निशा जी , अलका जी , दिव्या जी , ज्योत्सना जी, मीनू झा जी, विनीता जी रोशनी जी ,दीप्ती जी सरिता जी सहित अनेक सखियों को मेरी होली की हार्दिक शुभ कामनाएं मीनाक्षी श्रीवास्तव

के द्वारा: meenakshi meenakshi

के द्वारा: alkargupta1 alkargupta1

अजी हम क्यों डरें बसन्ती से ? डरें रामगढ़ के ठाकुर जिनको पहले ही ठूँठ बना चुका हूँ । एक मूँछ रह गई है, बस किसी दिन सोते समय उसपर भी उल्टा उस्तरा फ़ेर देना है बस, हमारा रास्ता साफ़ । आपको क्या पता नहीं कि यहाँ से पचास-पचास कोस दूर गाँव में रात को जब कोई बच्चा रोता है, तो माँ कहती है कि बेटा सो जा । सो जा, नहीं तो गब्बर सिंह आ जाएगा । वह तो वाहिद और रतूड़ी जी जैसे लंगोटियों ने हमारे नाम के खौफ़ को मिट्टी में मिला दिया, राजकमल शर्मा जैसे बेवफ़ा दोस्त ने चूना लगा दिया, वरना जब चाहूँ, जिसे चाहूँ, पकड़कर रंग डालूँ और कोई चूँ भी न करे । होली कब है, कब है होली ? कब ?? हुम्म हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा !!!!

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

होली आई रे कन्हाई..... होली आयी रे कन्हाई, होली आयी रे. होली आयी रे कन्हाई रंग छलके सुना दे ज़रा बांसरी को : होली आयी रे कन्हाई रंग ... कारन घरसे आई, तोरे कारन हो तोरे कारन घरसे आई हूँ निकलके सुना दे ज़रा बांसरी को (स्त्री) : होली आयी रे कन्हाई रंग छलके ... ***** इशारों को अगर समझो राज को राज रहने दो! इतनी अच्छी होली का अवतरण वह भी बसन्ती के इस्टाईल में.... वाह गुरु वाह ! मैंने भी भंग चढ़ा ली है ... मूंछे अपनी मुड़ा ली है धर विरहिन का रूप सरसों का खेत सम्हाली है! ढोल मंजीरा साथ बजे, यह सुर भी देख सजा ली है ! पहले हम लुक छिप खूब मिले, अब आयी ये होली है! ..... दरोगा जी, चोरी हो गयी ...चोरी हो गयी उट्ठो कलम दवात लो लिखो रपट में ऐसा ...... बस आज इतना ही ...उम्मीद है, पूर्णिमा के दिन पूरा चाँद दिखेगा अभी धीरे धीरे बदली छंट रही है! मजा आ रहा है! प्रणाम करता हूँ, इस अनूठे अवतरण को!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

सर्व प्रथम - मैं अपनी प्यारी सखी बसंती जी का इस स्पेशल "होली धमाल " मंच पर प्यार भरा स्वागत एवं स्नेहालिंगन ! बहुत सुन्दर ..कलात्मक एवं विविध रंगों से सजा यह ब्लॉग अति शोभनीय है. कुछ खास पंक्तियाँ - क्या बात है ! एक धमाकेदार प्रवेश - (बसंती की विशेष स्टाइल)" बसंती ! चौंक क्यों गए भूल गए क्या साहेब , आपने क्या सोचा था जागरण पर आपका ही राज ..." फिर " और हमें पता चला था कि जागरण वालों को होली मनाने का बड़ा शौक है " "फाल्गुनी रंगीन बयारों के झोंकेसभी को अपने आगोश में ले उससे पहले हीमैं निकल पड़ी ऋतुराज के स्वागत में और पहुँच गयी जागरण मंच पर…………." "विविध रंगों से सराबोर रंगोत्सव !!!!! " हे ऋतुराज ! स्वागतोत्सुक तुम्हार चल रही सुगन्धित फाल्गुनी बयार | कर रही तुम्हारा अभिनन्दन बार-बार !!!!! " अर्थात पूरी प्रस्तुति बेहद सटीक और रंगीन लगी. आप सभी सखियों को बहुत-२ हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं ! मीनाक्षी श्रीवास्तव

के द्वारा: meenakshi meenakshi

आदरणीया वसंती जी सादर अभिवादन आपका इस मंच पर हार्दिक स्वागत है. गत वर्ष होली इस मंच पर ऐतिहासिक थी. इस वर्ष प्रतीक्षा थी की क्या होता है. भाई जवाहर जी विदेशी रंग लेने गए हैं. हिन्दुस्तानियों पर अब वही रंग चढ़ता है. चीन से अब गहरा नाता है. आस्तीन का सांप लोगों को भाता है. हम भी हैं पुराने बंजारे नागों को नाथना आता है. आशा है आप अपनी पोस्ट पर लोगों को होली खेलने का सुअवसर देंगी. पर होली तो होली ही होती है. काल रंग भी खिल जाता है. उद्देश्य नहीं होता कुछ भी वैसा बाद में दिल मिल जाता है. आदरणीया अलका जी और आपको बधाई प्रारंभिक जोडी के रूप में उतरने हेतु. व् होली की सपरिवार शुभ कामनाये भही स्वीकार करें. सादर बधाई.

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA